क्या है महिलाओं में यूटीआई की समस्या? यूटीआई होने पर महिलाओं को सेक्स से जुड़ी किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? डॉक्टर से जानें

Maternity health concern

आज के समय में लोगों का खानपान बहुत ही ज्यादा बदल गया है, जो उनकी सेहत को बुरी तरीके से प्रभावित करता है। दरअसल, आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें, कि रोजाना गैर सेहतमंद खाने का सेवन करना, गंदी टॉयलेट सीट का इस्तेमाल करना और न जाने ऐसे बहुत से कारणों की वजह से महिलाओं को तरह -तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जिसमें UTI यानी कि यूरीनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन की समस्या शामिल हो सकती है। असल में, महिलाओं में UTI की समस्या होना बहुत ही आम होता है, जिस पर अगर वक्त रहते ध्यान न दिया जाये, तो यह समस्या आगे चलकर सेहत के लिए काफी ज्यादा नुकसानदायक हो सकती है। इतना ही नहीं, इस समस्या के बढ़ने पर महिअलों को सेक्स के दौरान कई तरह की समस्यायों का सामना करना पड़ सकता है।  अक्सर यह पाया जाता है, कि महिलाएं और पुरुष सेक्स के दौरान अपनी सेहत का बिल्कुल भी ध्यान नहीं रखते हैं और इस बात को आसानी से नज़रअंदाज कर देते हैं। इस तरह की स्थिति में, हम सभी को इसके बारे में जानना बहुत ही ज्यादा जरूरी हो जाता है, कि जब महिलाएं सेहत से जुड़ी तरह तरह की समस्याओं जैसे UTI की समस्या से जूझ रही होती हैं, तो सेक्स के दौरान उन को बहुत सी महत्वपूर्ण बातों का ध्यान करना जरूरी होता है।  ऐसे में बहुत सी महिलाएं जानना चाहती हैं, कि आखिर यूटीआई की समस्या क्या होती है और महिलाओं को यूटीआई की समस्या होने पर सेक्स से जुड़ी किन जरूरी बातों का ध्यान रखना होता है? दरअसल, ज्यादातर महिलाओं में पेशाब की नली का संक्रमण होना बहुत आम है, जिसे यूटीआई कहा जाता है। ऐसे में महिलाओं को पेशाब वाली जगह पर जलन होना, बार बार पेशाब आना, दर्द होना या फिर पेशाब करते वक्त खून आना जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ऐसे में अगर महिलाएं सेक्स करती हैं, तो यह समस्याएं और भी ज्यादा बढ़ सकती हैं और ठीक होने में ज्यादा वक्त ले सकती हैं। अगर आप चाहती हैं, कि यह समस्या ज्यादा न बढ़े और अपने पार्टनर के साथ संबंध बनाते वक्त आपको किसी भी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े, तो आपको इस दौरान इन बातों का ध्यान रखना महत्वपूर्ण होता है, जिसमें सेक्स से परहेज करना, कंडोम का इस्तेमाल करना, सफाई का पूरा ध्यान रखना और साथ में शरीर के संकेतों को नजरअंदाज न करना शामिल होता है। आइये इस लेख के माध्यम से इसके बारे में इस के डॉक्टर से और विस्तार से जानकारी प्राप्त करते हैं।  यूटीआई होने पर शारीरिक संबंध बनाने से जुड़ी ख़ास बातें यूटीआई के दौरान महिलाओं को सेक्स करते वक्त निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए, जैसे कि  1. सेक्स से परहेज करें  यूटीआई की समस्या होने पर कुछ दिनों तक सेक्स से परहेज करें। जब तक कि आपका इलाज पूरा न हो जाए और जलन या फिर दर्द जैसे लक्षण खत्म न हो जाएँ आपके लिए तब तक सेक्स से दूरी बनाकर रखनी ही ठीक होगी। ऐसा करने पर आप इस समस्या से जल्दी छुटकारा पा सकते हैं। वहीं अगर इस समस्या के चलते आप बिना सोचे समँझे सेक्स करते हैं, तो इससे न केवल आपकी इंफेक्शन बढ़ सकती है, बल्कि इससे दर्द भी काफी हद तक बढ़ सकता है।  2. शरीर के संकेतों को नजरअंदाज न करें दरअसल, इस तरह की स्थिति में विशेष तौर पर सेक्स के दौरान होने वाली असुविधा जैसे शरीर से जुड़े किसी भी तरह के संकेतों को अनदेखा करना सेहत के लिए हानिकारक साबित हो सकता है। सेक्स के दौरान, असहजता, दर्द, जलन या फिर खून आना जैसे लक्षणों को आम समझ कर नजरअंदाज न करें। इस दौरान तुरंत रुके और अपने डॉक्टर से संपर्क करें, क्योंकि यह लक्षण आपके शरीर के अंदर की समस्याओं का संकेत भी हो सकते हैं, जो किसी संक्रमण, एलर्जी या फिर अन्य सेहत से जुड़ी समस्या के कारण हो सकते हैं। इनका समय पर इलाज करवाना बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।  3. इलाज अधूरा न छोड़ें यूटीआई, जैसी समस्या का इलाज एंटीबायोटिक दवाओं से होता है, पर बहुत सी महिलाएं इन दवाओं को बीच में ही छोड़ देती हैं, क्योंकि इससे कुछ ही दिनों में लक्षणों में सुधार हो जाता है। इलाज पूरा न लेने पर इंफेक्शन बार-बार लौट सकती है, क्योंकि इस दौरान बैक्टीरिया पूरी तरीके से ठीक नहीं हो पाता है। इसलिए डॉक्टर की सलाह पर पूरा इलाज लेना महत्वपूर्ण होता है।  निष्कर्ष: सेक्स के दौरान UTI की समस्या को हलके में लेना एक बहुत बड़ी गलती हो सकती है। यह बात सही है, कि महिलाओं में पेशाब की नली का संक्रमण होना बहुत आम है, जिसे यूटीआई कहा जाता है, पर वक़्त रहते इस पर ध्यान न देना इस रोग की गंभीरता को और भी ज्यादा बढ़ा सकता है। हर महिला का शरीर अलग होता है, जिससे समस्या की गंभीरता भी काफी अगल हो सकती है। इस दौरान साफ़-सफाई का ध्यान रखने, थोड़ी सी सावधानी का इस्तेमाल करने और सही इलाज करने पर इस समस्या को जल्दी ठीक किया जा सकता है। UTI की समस्या ज्यादा बढ़ने और काफी लम्बे वक्त तक बने रहने पर आपको तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। इसके बारे में ज्यादा जानकारी प्राप्त करने के लिए और UTI जैसी समस्या का तुरंत समाधान पाने के लिए आप आज ही गुड हेल्थ क्लिनिक फॉर वीमेन में जाकर इसके विशेषज्ञों से इसके बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

डॉक्टर से जानिए, आखिर यीस्ट इंफेक्शन और बैक्टीरियल वेजिनोसिस के बीच क्या अंतर हो सकता है?

Implantation bleeding versus period

दरअसल, ज्यादातर महिलाएं अक्सर ऐसी समस्याओं को छुपा लेती हैं, जो उनकी वजाइना से जुड़ी होती हैं। क्योंकि हम में से ज्यादातर महिलाएं इस विशेष पर बात करने में काफी ज्यादा शर्म महसूस करती हैं। पर, अगर वजाइना से जुड़ी किसी भी तरह की समस्या को आप लगातार छुपाती हैं, या फिर उसको नज़रअंदाज कर किसी को भी नहीं बताती हैं, तो यह समस्याएं आगे चलकर आप के लिए काफी ज्यादा खतरनाक और गंभीर रूप ले सकती हैं। दरअसल, आप की जानकारी के लिए आप को बता दें, कि आप को वजाइना से जुड़ी कई तरह कि समस्यायों का सामना करना पड़ सकता है, जिसमें यीस्ट इन्फेक्शन और बैक्टीरियल वेजिनोसिस जैसी समस्यायों का होना शामिल हो सकता है। अगर इन समस्याओं का इलाज समय पर नहीं किया जाता है, तो यह आपकी सेहत के लिए खतरनाक साबित हो सकती हैं। इसलिए, इन पर महत्वपूर्ण ध्यान देना बहुत ही ज्यादा जरूरी होता है।  दरअसल, बहुत सी महिलाएं इन समस्याओं को लेकर दुविधा में फंसी रहती हैं और उनको इन दोनों के बीच किसी भी तरह का कोई भी फर्क नज़र नहीं आता है। ऐसे में ज्यादातर महिलाएं इसी सवाल को जानना चाहती हैं, कि आखिर यीस्ट इंफेक्शन और बैक्टीरियल वेजिनोसिस के बीच क्या अंतर होता है? दरअसल, यीस्ट इंफेक्शन एक बैक्टीरियल इन्फेक्शन है, जो वजाइना के साथ -साथ शरीर के दूसरे हिस्सों जैसे त्वचा, मुंह और ग्रासनली को भी प्रभावित करती है और वहीं, बैक्टीरियल वेजिनोसिस केवल वजाइना पर ही अपना प्रभाव डालती है। यीस्ट इन्फेक्शन का निर्माण एक कैंडिडा नाम के फंगस के कारण होता है, जो आम से लेकर काफी ज्यादा गंभीर हो सकता है। इसके अलावा, यीस्ट इन्फेक्शन का इलाज स्थिति की गंभीरता के आधार पर किया जा सकता है। इसके साथ ही, बैक्टीरियल वेजिनोसिस एक आम वजाइनल इंफेक्शन की तरह होती है, जो आम तौर पर, वजाइना में रहने वाले कुछ आम बैक्टीरिया के जरूरत से ज्यादा बढ़ने पर होती है। इस समस्या से पीड़ित महिलाओं को सफेद या फिर भूरे रंग का वेजाइनल डिस्चार्ज हो सकता है, जिसमें से काफी ज्यादा गंदी बदबू आती है। इस समस्या का इलाज एंटीबायोटिक की सहायता से आसानी से हो सकता है। आइये इस लेख के माध्यम से इसके बारे में इस के डॉक्टर से और विस्तार से जानकारी प्राप्त करते हैं।  यीस्ट इन्फेक्शन किन कारणों से हो सकती है? दरअसल, एक कैंडिडा नाम के फंगस की वजह से यीस्ट इन्फेक्शन का निर्माण होता है। आम तौर पर, वजाइना में थोड़ी मात्रा में कैंडिडा होना एक आम बात होती है, पर जब ये अच्छे बैक्टीरिया काफी ज़्यादा बढ़ जाते हैं, तो यीस्ट इन्फेक्शन का खतरा भी काफी ज्यादा बना रहता है। वजाइना में इस तरह की  इन्फेक्शन के बढ़ने के कई कारण हो सकते हैं, इसमें से कुछ निम्नलिखत अनुसार हो सकते हैं, जैसे कि  1. गीले शरीर पर ही कपड़ों को पहन लेना।  2. डायबिटीज जैसी समस्या का होना।  3. बहुत ज्यादा तनाव में रहना और नींद की गड़बड़ी होना।  4. इस दौरान, ड्यूज या फिर वजाइनल स्प्रे का काफी ज्यादा इस्तेमाल करना।  5. ब्रेस्टफीड कराने वाली महिलाओं और प्रेगनेंसी में इसका खतरा काफी ज्यादा होता है।  बैक्टीरियल वेजिनोसिस किन कारणों से होती है? आम तौर पर, बैक्टीरियल वेजिनोसिस जैसी समस्या के बहुत से कारण हो सकते हैं, जिसमें से कुछ निम्नलिखित अनुसार हो सकते हैं, जैसे कि  1. वजाइना में खराब बैक्टीरिया का बहुत ज़्यादा बढ़ जाना।  2. सेक्सुअली ट्रांसमिटेड इन्फेक्शन का होना।  3. बहुत से सेक्सुअल पार्टनर का होना।  4. वजाइना में पाए जाने वाले आम बैक्टीरिया की मात्रा में काफी ज्यादा बढ़ोतरी होना।   निष्कर्ष: दरअसल, इस लेख के माध्यम से हमने आपको यीस्ट इंफेक्शन और बैक्टीरियल वेजिनोसिस के बीच के अंतर के बारे में बताया है, जिसमें यीस्ट इंफेक्शन न केवल वजाइना को, बल्कि शरीर के दूसरे हिस्सों जैसे त्वचा, मुंह और ग्रासनली को भी प्रभावित करती है। इनका समय पर इलाज होना बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। इस तरह की स्थिति उत्पन्न होने पर इस बात का विशेष ध्यान रखें कि अगर आपको वजाइना से जुड़ी किसी तरह की कोई भी समस्या होती है, तो उसका तुरंत इलाज करवाएं। समस्या को नज़रअंदाज या फिर छुपाने से अच्छा है, कि आप एक बार अपने डॉक्टर से जरूर संपर्क करें।  वजाइना से जुड़ी किसी भी तरह की समस्या को अनदेखा न करें। अगर आप अपनी समस्या को नजरअंदाज करते हैं, तो इससे स्थिति और भी ज्यादा गंभीर हो सकती है। तो समस्या की गंभीरता से बचने के लिए अच्छा है, कि आप इसका इलाज समय पर कराएं। इसके बारे में ज्यादा जानकारी प्राप्त करने के लिए और वजाइना से जुड़ी किसी भी तरह की समस्या का तुरंत समाधान पाने के लिए आप आज ही द गुड हेल्थ क्लिनिक फॉर वूमेन में जाकर आपकी अपॉइंटमेंट को बुक करवा सकते हैं और इसके विशेषज्ञों से इसके इलाज के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

महिलाओं के लिए शिलाजीत के क्या-क्या फायदे हो सकते हैं? जानें डॉक्टर से

Ayurvedic shilajit benefits

असल में, 35 साल की उम्र के बाद सभी महिलाओं के जीवन में कई तरह के बदलाव देखने को मिलते हैं, जिसमें हार्मोनल बदलाव, प्रजनन क्षमता में कमी, कमजोरी होना, थकान होना, मूड में बदलाव होना शामिल होता है। आम तौर पर, औरतों की उम्र बढ़ने के साथ -साथ उनकी शारीरिक शक्ति भी काफी ज्यादा कम होने लग जाती है और मानसिक सेहत में भी काफी ज्यादा बदलाव होने लग जाता है। जिसकी वजह से वह काफी ज्यादा परेशान रहने लग जाती हैं। इसके साथ ही, इस उम्र में उनको प्री- मेनोपॉज़ और मेनोपॉज़ जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ता है। आम तौर पर, इस तरह की स्थिति में, ज्यादातर महिलाओं को अन्य चीजों के साथ -साथ अपने खान- पान पर भी ख़ास ध्यान देने की काफी ज्यादा जरूरत होती है।  ऐसे में, डॉक्टर ज्यादातर महिलाओं को शिलाजीत का सेवन करने की सलाह प्रदान करते हैं। शिलाजीत एक आयुर्वेदिक औषधी है, जो ज्यादातर पहाड़ी चट्टानों में पाई जाती है। दरअसल, पिछले कई सालों से आयुर्वेद में शिलाजीत का इस्तेमाल किया जा रहा है। आम तौर पर, शिलाजीत का सेवन करने से कई तरह की बीमारियों को ठीक किया जा सकता है, जिस में, डायबिटीज, यूरिनरी, इम्यून, हार्ट और पाचन से जुड़ी बीमारियां शामिल होती हैं। इसके साथ ही, महिलाओं की सेहत के लिए भी शिलाजीत काफी ज्यादा लाभकारी सिद्ध होता है। शिलाजीत से महिलाओं को मिलने वाले फायदों में, हार्मोनल इम्बैलेंस से राहत मिलना, किसी भी तरह की कोई भी कमजोरी दूर होना और डायबिटीज जैसी समस्या को कंट्रोल करना आदि शामिल होता है। आइये इस लेख के माध्यम से इसके बारे में इस के डॉक्टर से और विस्तार से जानकारी प्राप्त करते हैं।  महिलाओं के लिए शिलाजीत के फायदे  आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें, कि शिलाजीत पहाड़ी चट्टानों में पाई जाने वाली एक प्रकार की आयुर्वेदिक औषधी है, जो कई तरह की समस्यायों को ठीक करने के लिए पिछले कई सालों से आयुर्वेद में इस्तेमाल की जा रही है। महिलाओं को यह कई तरह के फायदे प्रदान कर सकता है, जिनमें निम्नलिखित शामिल हो सकते हैं, जैसे कि  1. हार्मोनल इम्बैलेंस से राहत दरअसल, एक उम्र में आकर सभी महिलाओं को हॉर्मोनल असंतुलन जैसी समस्या का सामना करना पड़ता है। शरीर में हो रहे इन्हीं हॉर्मोनल असंतुलन के कारण महिलाओं को कई तरह की समस्यायों का सामना करना पड़ता है, जिसकी वजह से उनकी सेक्स करने की इच्छा काफी ज्यादा प्रभावित जो जाती है। पर, इस दौरान शिलाजीत का सेवन करने से इस तरह की समस्या का समाधान किया जा सकता है और लिबिडो में भी काफी सुधार हो सकता है।  2. कमजोरी दूर होती है आम तौर पर, अगर किसी भी महिअलों को किसी भी समय थकान या फिर कमजोरी का अहसास होता है, तो इस तरह की स्थिति में वह शिलाजीत का सेवन कर सकती हैं। दरअसल, इससे शरीर को कई तरह के फायदे प्राप्त होते हैं, जिसमें एक महिला के शरीर को ऊर्जा प्राप्त होती है और कमजोरी दूर होती है। 3. डायबिटीज मैनेजमेंट दरअसल, डायबिटीज जैसी समस्या के लिए भी शिलाजीत का सेवन किया जा सकता है। आम तौर पर, शरीर में ब्लड ग्लूकोज के स्तर को कंट्रोल में रखने के लिए शिलाजीत का सेवन काफी ज्यादा लाभकारी साबित हो सकता है। असल में, जिन महिलाओं को डायबिटीज जैसी समस्या होती है, वह शिलाजीत का सेवन डॉक्टर की सलाह पर कर सकती हैं।  निष्कर्ष:  शिलाजीत पहाड़ी चट्टानों में पाई जाने वाली एक तरह की आयुर्वेदिक औषधी है, जिसका इस्तेमाल पिछले कई सालों से आयुर्वेद में किया जा रहा है। शिलाजीत का सेवन करने से कई तरह की बिमारिओं की ठीक किय जा सकता है। आयुर्वेद के अनुसार, शिलाजीत में कई औषधिये गुण पाए जाते हैं, जो सभी महिलाओं को कई तरह के लाभ प्रदान करते हैं, जिसमें हॉर्मोनल इम्बैलेंस से राहत मिलना, ब्लड ग्लूकोज लेवल कंट्रोल रहना और किसी भी तरह की कमजोरी दूर होना शामिल होता है। मेनोपॉज के दौरान, होने वाली समस्याओं से राहत पाने के लिए भी शिलाजीत का सेवन काफी ज्यादा फायदेमंद सिद्ध होता है। इसके बारे में ज्यादा जानकारी प्राप्त करने के लिए और किसी भी तरह की समस्या का समाधान पाने के लिए आप आज ही गुड हेल्थ क्लिनिक फॉर वूमेन में जाकर अपनी अपॉइंटमेंट को बुक करवा सकती हैं और इसके बारे में जानकारी प्राप्त कर सकती हैं।

पीरियड में कम ब्लीडिंग होने के क्या कारण हो सकते हैं? डॉक्टर से जानें इसके उपचारों के बारे में

Period Bleeding Discomfort

असल में, पीरियड्स एक प्राकृतिक जैविक प्रक्रिया है, जो हर महीने और हर महिला को होते हैं। आम तौर पर, माहवारी के इस चक्र से सभी महिलाओं को गुजरना पड़ता है, जो महिलाओं में उनके रिप्रोडक्टिव साइकिल के हिस्से के तौर पर होता है। आपको बता दें, कि महिलाओं में यह हल्के दर्द या फिर तेज दर्द वाले भी हो सकते हैं। आम तौर पर, इस दौरान महिओं में कई हार्मोनल बदलाव देखे जाते हैं, जो उनकी सेहत के साथ जुड़े होते हैं। हालांकि, अपनी जानकारी के लिए आपको बता दें, कि पीरियड के रक्तस्राव की तीव्रता और समय हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकती है। आम तौर पर, कुछ महिलाओं में पीरियड के दौरान कम रक्तस्राव देखने को मिल सकता है, जिस को ज्यादातर हाइपोमेनोरिया के नाम से जाना जाता है। हालांकि, यह कुछ महिलाओं में आम बदलाव के साथ -साथ अंदरूनी स्वास्थ्य समस्याओं का भी संकेत हो सकता है।  दरअसल, इस तरह की स्थिति में कई महिअलों के मन में यह सवाल उठता है, कि आखिर पीरियड में कम ब्लीडिंग होने के क्या कारण हो सकते हैं? दरअसल, महिलाओं में इस तरह की स्थिति उत्पन्न होना एक आम बात हो सकती है। हार्मोनल असंतुलन, पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (पीसीओएस), थायराइड रोग, काफी ज्यादा व्यायाम या फिर काफी ज्यादा वजन घटना, तनाव और मानसिक स्वास्थ्य, गर्भाशय संबंधी असामान्यताएं, कुछ दवाएं, पेरिमेनोपॉज और मेनोपॉज आदि जैसे कारण इसके लिए जिम्मेदार हो सकते हैं। जिसका उपचार हार्मोन थेरेपी, जीवनशैली में बदलाव, अंदरूनी स्थिति का उपचार, सर्जिकल इंटरवेंशन और नियमित निगरानी से किया जा सकता है। आइये इस लेख के माध्यम से इसके बारे में इस के डॉक्टर से विस्तार से जानकारी प्राप्त करते हैं।  पीरियड में रक्तस्राव कम होने के कारण दरअसल, माहवारी में रक्तस्राव कम होने के कई कारण हो सकते हैं, इसमें से कुछ निम्नलिखित शामिल हो सकते हैं, जैसे कई  1. हार्मोनल असंतुलन दरअसल, माहवारी चक्र को नियमित रखने में विशेष रूप से एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हार्मोनल स्तर में उतार-चढ़ाव के नतीजन गर्भाशय की परत में काफी ज्यादा बदलाव आ सकते हैं और माहवारी के दौरान रक्तस्राव कम हो सकता है। 2. पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (पीसीओएस) आम तौर पर, पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम एक तरीके का हार्मोनल विकार है, जो अक्सर अन्य लक्षणों जैसे वजन बढ़ने, मुंहासे और बालों के ज्यादा बढ़ने की वजह से होता है। इसके अलावा, यह स्थिति अनियमित या फिर अनुपस्थित पीरियड का कारण बन सकती है, जो आम तौर पर, कम रक्तस्राव के रूप में प्रकट हो हो सकती है।  3. थायराइड रोग दरअसल, अंडरएक्टिव थायराइड और ओवरएक्टिव थायरॉयड यह दोनों आम माहवारी चक्र में रुकावट पैदा कर सकते हैं। आम तौर पर, थायराइड हार्मोन माहवारी चक्र पर असर डालते हैं, जिससे माहवारी के असंतुलन से हल्के या फिर अनियमित रक्तस्राव जैसी समस्या हो सकती है।  4. गर्भाशय से जुड़ी असामान्यताएं आम तौर पर, यूट्रस फाइब्रॉएड, पॉलीप्स या फिर अधेसन, जैसी गर्भाशय से जुड़ी समस्याएं पीरियड्स के प्रवाह पर असर डाल सकती हैं, जिसके परिणामस्वरूप माहवारी के दौरान रक्तस्राव कम हो सकता है।  5. कुछ दवाएं हार्मोनल गर्भनिरोधक दवाएँ या फिर इंट्रा यूटेराइन डिवाइस साइड इफेक्ट के तौर पर हल्के पीरियड्स का कारण बन सकते हैं।  पीरियड में रक्तस्राव कम होने के प्रबंधन और उपचार माहवारी में रक्तस्राव कम होने के प्रबंधन और उपचार में निम्नलिखित विकल्प शामिल हो सकते हैं, जैसे कि  1. डॉक्टर से परामर्श असल में, अगर आपको अपने पीरियड्स के दौरान रक्तस्राव के पैटर्न में कोई बड़ा बदलाव महसूस होता है, तो आपको तुरंत अपने डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। आम तौर पर, वह आपकी पूरी जांच कर सकते हैं, जिसमें मेडिकल हिस्ट्री, फिजिकल जांच और शायद कुछ टेस्ट शामिल होते हैं, जिससे अंदरूनी कारणों का पता लगाया जा सकता है।  2. हार्मोन थेरेपी  दरअसल, हार्मोनल असंतुलन जैसी स्थितियों में, माहवारी चक्र को नियमित करने के लिए हार्मोन थेरेपी की सलाह दी जा सकती है। आम तौर पर, इसमें जन्म नियंत्रण की गोलियाँ या फिर अन्य हार्मोन-नियमन करने वाली दवाओं का इस्तेमाल भी शामिल हो सकता है।  3. जीवनशैली में बदलाव  दरअसल, काफी ज्यादा व्यायाम, खराब पोषण और तनाव जैसे कारकों को सही रखने से सामान्य हार्मोनल संतुलन को ठीक करने में काफी ज्यादा सहायता प्राप्त हो सकती है। सेहतमंद आहार, तनाव प्रबंधन तकनीक और हल्की एक्सरसाइज सेहतमंद पीरियड पैटर्न में मदद कर सकते हैं।  निष्कर्ष: पीरियड्स एक प्राकृतिक जैविक प्रक्रिया है, जो हर महिला में देखने को मिल सकती है। दरअसल, कुछ महिलाओं में पीरियड के दौरान कम रक्तस्राव देखने को मिल सकता है, जिस को ज्यादातर हाइपोमेनोरिया के नाम से जाना जाता है। महिलाओं में पीरियड के दौरान कम ब्लीडिंग होने के कई कारण हो सकते हैं, जैसे कि हार्मोनल असंतुलन, पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (पीसीओएस), थायराइड रोग, काफी ज्यादा व्यायाम या फिर वजन घटना, तनाव, गर्भाशय संबंधी असामान्यताएं और कुछ दवाएं आदि। अगर आपको भी माहवारी के दौरान कम रक्तस्राव जैसी समस्या का सामना करना पड़ रहा है और आप इसका समाधान चाहती हैं, तो आप आज ही गुड हेल्थ क्लिनिक फॉर वूमेन में जाकर इस के विशेषज्ञों से इसके इलाज के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं |

क्या विटामिन डी की कमी से स्पॉटिंग की समस्या हो सकती है? डॉक्टर से जानें

vitamin d deficiency

आपने अक्सर यह सुना ही होगा, कि पोषक तत्वों की कमी से इंसान को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसी तरह विटामिन-डी की कमी की वजह से एक व्यक्ति को कई तरह की समस्याएं हो सकती हैं, जैसे कि हड्डियों में दर्द होना, जोड़ों में दर्द होना और मांसपेशियों का काफी ज्यादा कमजोर हो जाना आदि। आपको बता दें, कि विटामिन-डी की कमी से न सिर्फ हड्डियों और मांसपेशियों से जुड़ी समस्याएं होती हैं, बल्कि इसकी कमी के कारण शरीर में हार्मोनल इंबैलेंस और ऑटोइम्यून डिजीज जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं। आम तौर पर, इस तरह की स्थिति में, कई महिलाओं के मन में, यह सवाल जरूर उठता है, कि क्या विटामिन-डी की कमी की वजह से महिलाओं में स्पॉटिंग जैसी समस्या हो सकती है? तो इस पर डॉक्टर का कहना है, कि नहीं, विटामिन डी की कमी के कारण सीधे तौर पर स्पॉटिंग जैसी समस्या नहीं हो सकती, पर आम तौर पर, विटामिन-डी की कमी की वजह से महिलाओं में पीरियड्स से जुड़ी कई तरह की समस्या हो सकती हैं। जिसमें मासिक धर्म में अनियमितताएँ शामिल हो सकती हैं, दरअसल जो स्पॉटिंग या फिर दूसरी समस्याओं का कारण बन सकती हैं। आम तौर पर, इसलिए यह इस समस्या का सीधा कारण नहीं हो सकता है। आइये इस लेख के माध्यम से इसके बारे में, इस के डॉक्टर से विस्तार से जानकारी प्राप्त करते हैं।  क्या विटामिन-डी की कमी की वजह से स्पॉटिंग की समस्या हो सकती है? विटामिन-डी की कमी की वजह से एक व्यक्ति को कई तरह की समस्याएं हो सकती हैं। यह जानने से पहले, कि क्या विटामिन-डी की कमी की वजह से स्पॉटिंग जैसी समस्या हो सकती है, या फिर नहीं, इससे पहले इसके बारे में जानकारी प्राप्त कर लेते हैं, कि आखिर स्पॉटिंग की समस्या क्या होती है? आपको बता दें कि डॉक्टर के अनुसार, स्पॉटिंग यानी कि धब्बे एक तरीके से हल्का खून निकलना होता है, जो एक महिला की नियमित माहवारी से काफी ज्यादा अलग होती है। आम तौर पर, स्पॉटिंग की समस्या दो पीरियड्स के बीच हो सकती है, जैसे कि यह पीरियड्स खत्म होने के बाद, या फिर पीरियड्स से पहले भी हो सकती है। डॉक्टर के अनुसार, स्पॉटिंग की समस्या होना पूरी तरीके से आम होती है। हालांकि, आम तौर पर जहां तक सवाल इस बात का है, कि क्या विटामिन-डी की कमी की वजह से स्पॉटिंग जैसी समस्या हो सकती है? तो इस पर डॉक्टर का कहना है, कि विटामिन-डी की कमी के कारण महिलाओं में पीरियड्स से जुड़ी कई तरह की समस्याएं हो सकती हैं, पर विटामिन डी की कमी के कारण सीधे तौर पर स्पॉटिंग जैसी समस्या नहीं हो सकती है। इससे पीरियड्स से जुड़ी कई तरह की समस्याएं जिसमें मासिक धर्म में अनियमितताएँ शामिल हो सकती हैं, जो स्पॉटिंग या फिर दूसरी समस्याओं का कारण बन सकती हैं। एनसीबीआई में प्रकाशित एक लेख के अनुसार, विटामिन-डी की कमी को अनियमित पीरियड्स और स्पॉटिंग से जोड़ा गया है। दरअसल, रिपोर्ट के अनुसार विटामिन-डी सेक्स हार्मोन (एस्ट्रोजन/प्रोजेस्टेरोन) को रेगुलेट करने में काफी ज्यादा सहायता प्रदान करता है, जो आम तौर पर, मासिक चक्र को नियंत्रित करने में मदद करते हैं और साथ ही में ओवुलेशन और गर्भाशय की परत को बुरी तरह से प्रभावित करते हैं। निष्कर्ष : विटामिन-डी और स्पॉटिंग के बीच एक गहरा कनेक्शन पाया गया है, इसलिए अगर आपको पीरियड्स के दौरान स्पॉटिंग की समस्या हो रही है, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। इसके बारे में ज्यादा जानकारी प्राप्त करने और अगर आपको भी इस तरह की कोई समस्या हो रही है और आप इसका समाधान चाहते हैं, तो आप आज ही गुड हेल्थ क्लिनिक फॉर वूमेन में जाकर इस के विशेषज्ञों से इसके इलाज के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। अक्सर पूछे जाने वाले सवाल  प्रश्न 1. विटामिन-डी और स्पॉटिंग का आपस में क्या कनेक्शन है? विटामिन-डी और स्पॉटिंग के बीच एक गहरा कनेक्शन है, क्योंकि विटामिन-डी की कमी की वजह से हार्मोनल असंतुलन हो जाते हैं, जिसकी वजह से पीरियड्स में अनियमितताएँ, स्पॉटिंग और PCOS जैसी समस्याएं हो सकती हैं।  प्रश्न 2. क्या विटामिन-डी की कमी की वजह से स्पॉटिंग की समस्या हो सकती है? नहीं, विटामिन डी की कमी के कारण सीधे तौर पर स्पॉटिंग की समस्या नहीं हो सकती, पर विटामिन-डी की कमी के कारण महिलाओं में पीरियड्स से जुड़ी कई समस्याएं हो सकती हैं। जिस में मासिक धर्म में अनियमितताएँ शामिल हो सकती हैं, जो स्पॉटिंग या फिर दूसरी समस्याओं का कारण बनती हैं।

क्या प्रेगनेंसी में गुड़ का पानी पीना होता है अच्छा? इसे पीने से पहले डॉक्टर की सलाह ज़रूर लें

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इस बात को सभी जानते हैं, कि गर्भावस्था के दौरान महिलाएं कई तरह की समस्याओं से गुजरती है और इस तरह की स्थिति में उनके शरीर में कई तरह के हार्मोनल बदलाव आते हैं, आम तौर पर, जिनको वह अकेले ही सहती हैं। दरअसल, गर्भावस्था का दौर एक महिला के लिए काफी ज्यादा पीड़ादायक होता है। इस तरह की स्थिति में कई बार हर छोटी-छोटी परेशानी के लिए दवा का सेवन करने की बजाए, अपने रोजाना के खान-पान में कुछ नेचुरल बदलाव करने से काफी ज्यादा सहायता प्राप्त हो सकती है। जैसे कि गर्भावस्था के दौरान गुड़ के पानी का सेवन करना, हालांकि ,यह सुनकर आपको काफी ज्यादा हैरानी हो रही होगी, पर कई पुरानी बजुर्ग महिलेन गर्भावस्था के दौरान गुड़ के पानी का सेवन करने की सलाह प्रदान करती थीं। आपको बता दें कि उस दौरान उन महिलाओं का मानना था कि गुड़ के पानी का सेवन करने से गर्भवती महिलाओं में आयरन की कमी को कण्ट्रोल करने और इसके साथ ही, उनके पाचन से जुडी कई तरह की परेशानियों को कम करने में काफी ज्यादा सहायता प्राप्त हो सकती है। पर, आज के समय में कई गर्भवती महिलाओं के मन में यह सवाल उठता है, कि क्या ये तर्क सही है? क्या सच में गर्भावस्था के दौरान गुड़ का पानी पीना सेहत के लिए फायदेमंद हो सकता है। तो आइये इस लेख के माध्यम से इसके बारे डॉक्टर से विस्तार से जानकारी प्राप्त करते हैं, कि क्या प्रेगनेंसी में गुड़ का पानी पीना फायदेमंद हो सकता है? क्या गर्भावस्था के दौरान गुड़ का पानी अच्छा होता है?  दरअसल, इस पर डॉक्टर का कहना है, कि ज्यादातर गर्भावस्था के दौरान गुड़ के पानी का सेवन करना सुरक्षित होता है, पर इसका सेवन एक सिमित मात्रा में करना चाहिए, क्योंकि आम तौर पर यह शरीर को प्राकृतिक ऊर्जा, और आयरन प्रदान प्रदान करता है और इसके साथ ही कबज जैसी समस्या से बचाता है। आपको बता दें कि सर्दिओं जैसे मौसम में इसक सेवन करना काफी ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि आमतौर पर, यह गर्मी प्रदान करने और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में काफी जयादा सहायता प्रदान कर सकता है। आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें,कि इसके इलावा भी गर्भावस्था के दौरान गुड़ के पानी का सेवन करने के बहुत सारे फायदे हो सकते हैं, जैसे कि  1. गुड़ पाचन क्रिया में सहायक होता है इसके साथ ही, इसके बारे में डॉक्टर का कहना है, कि गुड़ एक व्यक्ति के पाचन में भी काफी ज्यादा सहायता प्रदान करता है। आम तौर पर, इस तरह की स्थिति में, ज्यादातर गर्भवती महिलाएं पेट से जुडी कई तरह की समस्यायों से जहज करहि होती हैं, जैसे कि गैस, बदहजमी और पाचन क्रिया से जुड़ी कई तरह की समस्यें आदि। इस दौरान गुड़ के सेवन से पाचन किरिया बेहतर बनती है और साथ में इससे खाना आसानी से पांच जाता है। आम तौर पर, केवल इतना ही नहीं गर्भावस्था के दौरान गुड़ के पानी का सेवन करने से अक्सर इस दौरान महिलाओं को होने वाली एसिडिटी और पेट दर्द जैसे लक्षणों से काफी ज्यादा राहत प्राप्त होती है।  2. मल त्याग को काफी ज्यादा बढ़ावा देता है आपको बता दें कि ज्यादातर गर्भावस्था के दौरान महिलाएं कब्ज जैसी समस्या से काफी ज्यादा परेशान रहती हैं। आम तौर पर, इस तरह की स्थीति में, गुड़ का हल्का लैक्सेटिव प्रभाव कबज जैसी समस्या को कंट्रोल करने और इस तरह की समस्या से राहत प्रदान करने में काफी ज्यादा सहयता प्रदान करता है। दरअसल, गर्भावस्था जैसी स्थिति में, यह एक महिला के पुरे पाचन में सुधार करता है और साथ ही भोजन करने के बाद पेट फूलने और बेचैनी जैसी समस्या को कम करने में काफी ज्यादा सहायता करता है। कुलमिलाकर गुड़ का सेवन सेहत के लिए काफी ज्यादा फायदेमंद होता है, पर गर्भवती महिलाओं को इसका सेवन सिमित मात्रा में ही करना चाहिए। निष्कर्ष गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को कई तरह की समस्याओं से गुराना पड़ता है। इस तरह की स्थिति में उसके शरीर में कई तरह के हार्मोनल बदलाव होते हैं। गर्भावस्था के दौरान, एक महिला को कई बार हर छोटी-छोटी परेशानी के लिए दवा का सेवन करने की बजाए, अपने रोजाना के खान-पान में कुछ नेचुरल बदलाव करने चाहिए, जैसे कि गुड़ के पानी का सेवन करना। हालाँकि,गर्भावस्था के दौरान गुड़ के पानी का सेवन करना सुरक्षित होता है, पर इसका सेवन एक सिमित मात्रा में करना चाहिए। डायबिटीज या फिर जेस्टेशनल डायबिटीज जैसी समस्या से पीड़ित गर्भवती महिलाओं को गुड़के पानी से सावधान रहना चाहिए, क्योंकि गुड़ में चीनी मौजूद होती है। गुड़ का पानी बहुत गर्म या फिर बहुत ठंडा पीने की बजाय गुनगुना पीना पीना सबसे ज्यादा अच्छा होता है। गर्भवती महिलाओं को इसके ज्यादा सेवन से बचना चाहिए और ज्यादातर इस को एक संतुलित आहार के तौर पर लेना चाहिए। इस तरह की स्थिति में, मां और बच्चे दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए, अपनी डाइट में गुड़ का पानी शामिल करने से पहले एक बार अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लें। अगर आपको भी इसके बारे में ज्यादा जानकारी प्राप्त करनी है, तो आज ही गुड हेल्थ क्लिनिक फॉर वूमेन में जाकर इसके विशेषज्ञों से इसके बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

क्या गर्भवती महिला के लिए आठवें महीने में डिलीवरी कराना सुरक्षित होता है? डॉक्टर से जानें इसके जोखिम

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एक महिला के लिए गर्भवती होना उसकी ज़िंदगी का एक बहुत ही जरूरी हिस्सा होता है। आपको बता दें, कि महिला के लिए गर्भावस्था का सफर जितना ज्यादा उतार -चढ़ाव के साथ भरा हुआ होता है, डिलीवरी उतनी ही ज्यादा मुश्किलों से भरी हुई होती है। गर्भावस्था के समय एक महिला को कई तरह की समस्यायों का सामना करना पड़ता है। आम तौर पर, अक्सर इस तरह की स्थिति में, सभी महिलाओं के मन में गर्भावस्था के बाद डिलीवरी को लेके कई तरह के सवाल आते हैं। आपको बता दें, कि ज्यादातर गर्भवती महिलाएं डिलीवरी के बारे में सोचकर ही घबरा जाती हैं, आम तौर पर, क्योंकि लेबर पेन बहुत ही ज्यादा तेज और बर्दाश्त से बाहर होता है। हालांकि, इस तरह की स्थिति में, बहुत सारी महिलाओं की यह कामना होती है, कि गर्भावस्था के बाद, उनकी एक नॉर्मल डिलीवरी हो यानी कि वजाइनल डिलीवरी हो और साथ ही ठीक समय पर हो। इस तरह की स्थिति में, हर गर्भवती महिला के मन में यह सवाल रहता है, कि गर्भावस्था के बाद, एक बच्चे के जनम के लिए आखिर कौन सा महीना या फिर सप्ताह सब से ज्यादा बढ़िया रहता है, क्या इसके लिए 34वां सप्ताह, यानी कि आठवां महीना एक शिशु के जनम के लिए सामान्य माना जाता है? क्या 34 वें सप्ताह में एक गर्भवती महिला की डिलीवरी होना सुरक्षित होता है? तो आइये इस लेख के माध्यम से इसके डॉक्टर से इसके बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त करते हैं, कि क्या 34 वें सप्ताह में, यानी कि गर्भवती महिला के लिए आठवें महीने में डिलीवरी कराना सुरक्षित होता है? क्या 34 वें सप्ताह (आठवें महीने) में डिलीवरी होना एक महिला के लिए सुरक्षित माना जाता है? दरअसल, इस बात को सभी जानते हैं, कि गर्भावस्था के दौरान एक महिला को कई तरह की परेशानिओं का सामना करना पड़ता है। आम तौर पर, इस तर की स्थिति में डॉक्टर का कहना है, कि गर्भावस्था के बाद शिशु के जन्म के लिए 37वें सप्ताह से लेकर 42वें सप्ताह के बीच तक का समय सबसे ज्यादा बढ़िया माना जाता है। आपको बता दें, कि 37वें सप्ताह के बाद महिला के गर्भ में एक बच्चे का विकास पुरे तरीके से हो जाता है। असल में, ऐसे बच्चे प्रीटर्म डिलीवरी के दौरान पैदा हुए बच्चों की तुलना में काफी ज्यादा सेहतमंद होते हैं। आम तौर पर, यहां तक की उनकी म्यूनिटी भी उन बच्चों की तुलना में काफी ज्यादा बेहतर होती है।  दरअसल, इस तरह की स्थिति में, अब सवाल यह उठता है, कि क्या 34 वें सप्ताह में, यानी कि गर्भावस्था के आठवें महीने में डिलीवरी होना सुरक्षित माना जाता है, फिर नहीं। आम तौर पर, इस तरह की स्थिति में, इस पर डॉक्टर का कहना है, कि एक गर्भवती महिला की 34 वें सप्ताह में डिलीवरी सुरक्षित मानी जाती है, पर इस तरह की डिलीवरी को प्रीटर्म डिलीवरी कहा जाता है, भले ही डिलीवरी के बाद बच्चा स्वस्थ हो। विशेषज्ञों के अनुसार, आम तौर पर जो बच्चे 34 वें सप्ताह में पैदा होते हैं, असल में, उन बच्चों के बचने की संभावना काफी ज्यादा कम होती है और साथ ही, इस समय में पैदा हुए बच्चे काफी लम्बे समय तक बीमार रहते हैं। आपको बता दें कि इस तरह के बच्चों को हर वक्त एक विशेष देखभाल की काफी ज्यादा जरूरत होती है। आम तौर पर, सिर्फ इतना ही नहीं 34 वें सप्ताह में पैदा होने वाले बच्चों को कई बार, एनआईसीयू में रखा जाता है, ताकि उनकी विशेष निगरानी की जा सके। यह सब जानने के बाद, कुल मिलाकर आप यह कह सकते हैं, कि गर्भावस्था के 34 वें सप्ताह में पैदा होने वाले बच्चों को एक विशेष देखभाल की काफी ज्यादा जरूरत होती होती है। आम तौर पर, इसलिए एक गर्भवती महिला के लिए 34 वें सप्ताह यानी कि आठवें महीने में डिलीवरी पुरे तरीके से सुरक्षित नहीं मानी जा सकती है।  34 वें हफ़्ते में बच्चे के जन्म से जुड़े जोखिम 34 वें सप्ताह यानी कि गर्भावस्था के आठवें महीने में, बच्चे के जन्म से जुड़े जोखिम इस प्रकार हैं, जैसे कि  1. प्रीटर्म बर्थ डिलीवरी के रूप में देखा जाना।  2. बच्चों के बचने की सम्भावना कम होना।  3. बच्चे का लम्बे समय तक बीमार रहना।  4. एनआईसीयू केयर करना।  5. विशेष देखभाल की जरूरत होना।  6. संक्रमण, न्यूरोलॉजिकल जैसी अन्य समस्याएं होना।  निष्कर्ष महिला के लिए गर्भावस्था का सफर जितना ज्यादा उतार-चढ़ाव के साथ भरा हुआ होता है, डिलीवरी उतनी ही ज्यादा मुश्किलों से भरी हुई होती है। महिला की 34 वें सप्ताह में डिलीवरी सुरक्षित मानी जाती है, पर इस तरह की डिलीवरी को प्रीटर्म डिलीवरी कहा जाता है। 34 वें सप्ताह यानी कि गर्भावस्था के आठवें महीने में, बच्चे के जन्म से कई जोखिम जुड़े होते हैं, जैसे कि इस दौरान, बच्चों के बचने की सम्भावना कम होना और एनआईसीयू केयर करना आदि। इसलिए एक गर्भवती महिला के लिए 34 वें सप्ताह में डिलीवरी कराना पुरे तरीके से सुरक्षित नहीं माना जाता है। अगर आप भी इसके बारे में ज्यादा जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं, तो आप आज ही गुड हेल्थ क्लिनिक फॉर वूमेन में जाकर अपनी अपॉइंटमेंट को बुक करवा सकते हैं और इसके बारे हेमिन जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।